प्राथमिकता (सर्वाधिक व्यय) –
- ऊर्जा 37%
- सामाजिक व सामुदायिक सेवा 35.28%
- ग्रामीण विकास 9%
- कृषि एवं सहायक सेवाएँ 5.57%
- मुख्यमंत्री सलाहकार परिषद राज्य में पंचवर्षीय योजना के निर्माण हेतु राज्य नियोजन बोर्ड के स्थान पर इसका गठन किया गया।
- अध्यक्ष – मुख्य मंत्री, उपाध्यक्ष – डा. अरविंद पनगड़िया।
कृषि सम्बन्धी प्रमुख मुद्दे व सरकारी प्रयास
- राजस्थान के आर्थिक विकास में कृषि का विशेष महत्व है क्योंकि इसका GDP में योगदान पशुपालन सहित स्थिर मूल्यों पर 17.2% व प्रचलित में 22% है। इसके साथ-साथ कुल श्रमबल का 62% कृषि पर निर्भर है। यह कृषि क्षेत्र में उत्पादन व उत्पादकता को बढ़ाने पर बल देता है। राज्य में अनिश्चितता व अनियमितता से कृषि उत्पादन भी प्रभावित होता है।
- स्वतंत्रता के पश्चात आधे समय राजस्थान में अकाल व सूखे की स्थिति रही। राज्य में सकल सिंचित क्षेत्र में वृद्धि हुई लेकिन अधिकांश सिंचाई कुओं और नलकुपों से होती है जो भूजल दोहन को इंगित करता है। राज्य में कार्यशील जोतों का वितरण भी असमान है। अधिकांश जोते 1 हैक्टेयर तक की थी परंतु उसमें क्षेत्रफल कम था जबकि बड़ी जोतों में ज्यादा क्षेत्रफल पाया जाता है।
- कृषि पर आधारित पशु संपदा से दुग्ध उत्पादन व पशु आधारित उद्योगों के भी अनेक अवसर उपलब्ध है।
- कृषि से जुड़े प्रमुख मुद्दे –
कृषि से जुड़े प्रमुख मुद्दों के अन्तर्गत कृषिगत आगत का सही समय पर व उचित कीमत पर उपलब्धता, सिंचाई व कृषि उत्पाद के विपणन की व्यवस्था को ठीक करके ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार व आमदनी बढ़ाई जा सकती है। कृषि व पशुपालन परस्पर अंतः निर्भर क्रियाएँ है, अतः दोनों के विकास हेतु प्रयास करना चाहिए।
राज्य में सतही व भूमिगत जल संसाधन का अभाव है अतः इनके समुचित व प्रभावी उपभोग हेतु बुंद-बुंद व स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति का उपयोग व साथ ही जल संरक्षण को बढ़ावा देकर इनका रिचार्ज किया जाना चाहिए।
कृषि क्षेत्र में फसल विभेदीकरण व आधुनिकीकरण से उत्पादन में विविधता लाई जा सकती है। सूखे, अकाल आदि प्राकृतिक प्रकोपों से बचने के लिए फसल बीमा का विस्तार करके कृषकों को उचित राहत प्रदान की जा सकती है। विभिन्न सहकारी संस्थाओं द्वारा कम ब्याज दर पर ऋण दिया जाए। कृषि क्षेत्र में विभिन्न क्रांतियों को अपनाकर कृषि उत्पादन, रोजगार व आय में वृद्धि की जा सकती है। राज्य में पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान कृषि पर व्यय कम किया गया (12वीं 64%) भविष्य में कृषि विकास के लिए कुल व्यय में अधिक राशि का आवंटन किया जाए।
कृषि क्षेत्र में सब्सिडी के साथ निवेश को बढ़ावा दिया जाएं ताकि 3.5% वृद्धि दर के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके। इस प्रकार कृषि क्षेत्र के अनेक मुद्दे हैं जैसे उत्पादन, विपणन, कीमत निर्धारण, सब्सिडी, पशुपालन, वित्तीय सहायता, आधुनिकीकरण आदि। राज्य सरकार को इन सभी मुद्दों को शामिल करते हुए दीर्घकालिक कृषि नीति बनानी चाहिए जिससे कृषि उत्पादकता व उत्पादन में वृद्धि हो, साथ ही प्रोसेसिंग यूनिट्स की स्थापना से उत्पाद का मूल्यवर्धन किया जा सके ताकि कृषकों की आमदनी को बढ़ाया जा सके।
राजस्थान में उद्योग क्षेत्र से जुड़े प्रमुख तथ्य एवं मुद्दे
- केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (CSO) के अनुसार उद्योग क्षेत्र के अन्तर्गत खनन, उत्खनन, निर्माण, विनिर्माण तथा विद्युत जल व गैस आपूर्ति को शामिल किया जाता है।
- राजस्थान की GDP में उद्योग क्षेत्र का अंश =31.3% है तथा इसमें विनिर्माण क्षेत्र का योगदान केवल 14.7% है जो बहुत ही न्यून है। राज्य में विद्युत की स्थापित क्षमता लगभग 10,000 MW है। राजस्थान में फैक्ट्री क्षेत्र का विकास समस्त भारत की तुलना में निम्न है। राज्य में फैक्ट्रियों की संख्या, उनसे प्राप्त रोजगार तथा उसमें संलग्न पूंजी की मात्रा की दृष्टि से भी राजस्थान पिछड़ा हुआ है हालांकि कुटीर, ग्रामीण उद्योग व व हैण्डीक्राफ्ट्स में पर्याप्त विकास हुआ है। इससे निर्यात, आय व रोजगार में वृद्धि हुई है।
- केन्द्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में निवेश की दृष्टि से भी राजस्थान पिछड़ा हुआ है। कुल देश के निवेश का 2% राजस्थान में हुआ है। आजादी के बाद राज्य में कृषि आधारित, वन, पशुधन व खनिज आधारित उद्योगों का विकास हुआ। राज्य में हस्तनिर्मित व दस्तकारी की वस्तुएँ कोटा डोरिया का व्यापक प्रचलन हुआ तथा ‘मेड इन राजस्थान’ एक ब्राण्ड के रूप में लोकप्रिय हुआ। राज्य में भिवाड़ी, नीमराणा ऑटोमोबाइल क्षेत्र में हब के रूप में विकसित हुए।
- राज्य में फैक्ट्री क्षेत्र का विकास गुजरात व महाराष्ट्र की तुलना में कम हुआ है। इसके लिए घरेलु एवं विदेशी निवेश को आमंत्रित कर रोजगार व आय के अवसर बढ़ाने चाहिए। राज्य में उपलब्ध संसाधन जैसे तेल, प्राकृतिक गैस, खनिज etc. का दोहन कर इनके मूल्यवर्द्धन पर बल देना चाहिए।
- ग्रामीण क्षेत्र में कृषि व पशुधन आधारित उद्योगों की स्थापना की जाए। जिससे रोजगार अवसरों में वृद्धि हो। आधारभूत ढाँचे के विकास हेतु PPP मॉडल का उपयोग किया जा सकता है। निवेश को शीघ्र व पारदर्शी बनाने हेतु ‘सिंगल विण्डो’ का प्रयोग करना चाहिए।
- DMIC के सभी चरणों को तय समयावधि में पुरा कर राज्य में निवेश के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। मानव संसाधन में क्षमता विकास व कौशल उन्नयन के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए जिससे दक्ष श्रमिक व उद्यमी उपलब्ध हो सके। राज्य में पेट्रो केमिकल रिफाइनरी पर सही व शीघ्र निर्णय लिया जाये। आधुनिक उद्योगों के साथ-साथ परम्परागत ग्रामीण उद्योग व दस्तकारों को नवजीन प्रदान करने हेतु दीर्घकालिक नीति का उपयोग करना चाहिए।
सेवा क्षेत्र से जुड़े प्रमुख तथ्य व मुद्दे
- सेवा क्षेत्र के अन्तर्गत व्यापार, होटल, रेस्टोरेंट, बीमा बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार व दूरसंचार को शामिल किया जाता है। इसका राज्य की GDP में =48% योगदान है तथा इसमें सर्वाधिक व्यापार, होटल व रेस्टोरेंट (14.4%) का हिस्सा है।
- वर्तमान में सेवा क्षेत्र का योगदान निरंतर बढ़ रहा है लेकिन सेवाओं में विविधता होने के करण उनके समाधान भी भिन्न-भिनन है जैसे रेलवे व लोक प्रशासन सार्वजनिक क्षेत्र में है लेकिन आम जनता से निकट से जुड़े हैं। वहीं व्यापार, होटल व रेस्टोरेंट निजी क्षेत्र में है। इन सभी के विकास हेतु निम्नलिखित सुझाव दि जा सकते हैं-
- राजस्थान में विभिन्न सेवा क्षेत्रों में प्रचलित नियमों व नीतियों की समीक्षा की जानी चाहिए एवं तीव्र व सतत विकास की दृष्टि से इनमें संशोधन किया जाना चाहिए।
- राज्य में समृद्ध ऐतिहासिक विरासत के कारण पर्यटन सेवाओं का विस्तार किया जाना चाहिए इससे न केवल विदेशी मुद्रा का अर्जन होगा बल्कि अन्य सम्बद्ध क्षेत्रों होटल, रेस्ट्रा, परिवहन, निर्यातक वस्तुओं के उत्पादन व बिक्री को भी प्रोत्साहन मिलेगा। राज्य में लॉ एण्ड ऑर्डर सुचारू रखने के लिए लोक सेवाओं के रिक्त पद शीघ्र योग्य अभ्यर्थियों से भरे जाए व उनके शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए।
- रिटेल सेक्टर में मल्टी ब्राण्ड में FDI को पुर्ववर्ती सरकार ने अनुमति प्रदान की है जिसकी निरपेक्ष समीक्षा कर चरणबद्ध तरीके से शर्त सहित निवेश की अनुमति देनी चाहिए। साथ ही विदेशी कंपनियों की मॉनिटरिंग कर राज्य के सेवा क्षेत्र में वृद्धि की जा सकती है।
अब तक सरकार केवल औद्योगिक विकास, निवेश आदि पर बल देती थी लेकिन भविष्य में सेवा क्षेत्र में व्याप्त अनेक अवसर व चुनौतियों को देखते हुए विशेष बल देने की आवश्यकता है।